मैंने देखा है

 

    मैंने देखा है,
    दिन को सांझ होते हुए,
    मैंने देखा है,
    कली को फूल बनते हुए,
    मैंने देखा है,
    राह चलते मंजिल मिलते हुए,
    मैंने देखा है,
    इक्त्फाक होते हुए,
    वो बिन मौसम बरसात,
    वो रूठे बच्चे की निगाहों के जज़्बात,
    वो एक थपकी में सुकून की नींद का आना,
    वो ख़ुशी के आंसू छलकना ,
    वो रूठना – वो मनाना,
    वो अनकही बात समझ जाना,
    वो अँधेरे कमरे में मोमबत्ती की जगमगाहट,
    वो हर एक चीज़ को आपस में बराबर हिस्सों में बाटने की आदत,
    वो टकरार में भी परवाह का एहसास,
    मैंने देखा है,
    कोशिश करने से, हर उलझन सुलझते हुए,
    मैंने देखा है,
    ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से मिलते हुए।

3 Comments

  • Dr Manish Rastogi

    Beautiful poem

    April 4, 2017 - 6:06 pm Reply
    • admin

      Thank you 🙂

      April 5, 2017 - 1:09 pm Reply
    • admin

      This is the first poem written on “Maine Dekha Hai” long back, which is the origination of the name of this website 🙂

      April 5, 2017 - 1:09 pm Reply

Leave A Comment

Your email address will not be published.