करीबी

इस मसरूफ़ – फासले सी भरी दुनिया में, जाने क्यों किसी से दूर होने का एहसास ही करीबी बढ़ाता है ?

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ख्वाब

ख्वाब भी क्या खूब जरिया है, तुझ तक पहुँचने का, कि जब कभी हक़ीक़त जुदा करती है हमे , हम तेरे ख्वाबों की चादर ओढ़ लेते हैं।

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तेरी मर्ज़ी

तेरी मर्ज़ी ही है, जो आज आप और हम संग हैं, मृगतृष्णा (mirage) जो दिखी, उसे तेरी मर्ज़ी समझ वो पल भी सुकून से जीया है.

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[mainedekhahai]